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थोड़ी-सी हंसी, सेहत से दोस्ती

थोड़ी-सी हंसी, सेहत से दोस्ती


पिछली बार ठहाका कब लगाया था? यह सवाल एक मोटिवेशनल गुरु ने अपने एक सेशन में पूछा. अब तक जो लोग मुखर होकर अपनी समस्याओं के बारे में बात कर रहे थे चुप हो गए. इस सेशन में गृहिणियों से लेकर छात्र तक, कॉर्पोरेट जगत के अफ़सरों से लेकर रिटायर्ड लोग सभी थे. इस सवाल पर बगले झांकते हुए सबने महसूस किया कि यह इस सेशन का सबसे कठिन सवाल है. मुस्कुराने, हंसने और ठहाका लगाने में इतना ही अंतर है, जितना परेशान होने, ग़ुस्सा करने और चिल्लाने में है. चिल्लाना आसान है और यक़ीन मानिए इसमें हंसने से ज़्यादा मज़ा आता है. हंसने के लिए हमेशा ही प्रयास करने पड़ते हैं, जबकि ग़ुस्से के लिए कभी सब्ज़ी में नमक कम, कभी किसी से हल्की-सी बहस ही काफ़ी होती है. हंसने के लिए मेहनत करनी पड़ती है और चिल्लाने के लिए ख़ुद को बस ज़रा-सा धक्का देना होता है यानी किसी ने ज़रा-सा कुछ कहा और हम उबल पड़ते हैं. ज़ाहिर-सी बात है, आसान काम करना सभी को अच्छा लगता है यानी वक्त-बेवक़्त ग़ुस्सा करना आसान है. 



हंसोगे तो नहीं फंसोगे

चार्ली चैपलिन ने एक बार कहा था, हंसे बिना आपका दिन बेक़ार है. लेकिन ऐसा तो नहीं है कि हम अपना दिन बेक़ार कर देते हैं. हम हंसते तो हैं, कभी एसएमएस पर, कभी वॉट्स ऐप के चुटकुलों पर, कभी सोशल मीडिया की किसी पोस्ट पर. लेकिन ये हंसना भी कोई हंसना है, जब इसमें दोस्त शामिल न हों. दरअस्ल हंसी साइंस है. हंसने से शरीर में रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और शरीर के सभी अंगों में ऑक्सीजन पहुंचता है. जब ऑक्सीजन पहुंचता है तो टिशूज़ को नई ताक़त मिलती है और कोई भी ब्यूटी प्रॉडक्ट इस्तेमाल करने से ज़्यादा स्किन ग्लो करती है. और हां, आपने सुना होगा न वियर द स्माइल कैरी द एटिड्यूड. तो ड्रेस कितनी भी महंगी पहन लो यदि स्माइल नहीं होगी तो कुछ नहीं होगा. हंसते रहने से शरीर किसी बीमारी की जकड़ में नहीं फंसेगा और दिमाग़ तो रहेगा ही आज़ाद अच्छे ख़्यालों के लिए.


दिल तो बच्चा है जी
आपको पता है हम बड़े होने पर हंसने से परहेज़ क्यों करने लगते हैं? इसका जवाब ख़ुद सोचकर देखिए. यक़ीनन आप इस जवाब से सहमत होंगे, हंसना तो बच्चों का काम है. बच्चे आसपास की चिंता नहीं करते, माहौल की परवाह नहीं करते, इसलिए खुलकर हंस लेते हैं. हम बड़े दफ़्तर में बैठ कर नहीं हंस सकते, पार्टी में नहीं हंस सकते, मेहमानों के सामने नहीं हंस सकते, बाज़ार या मॉल में नहीं हंस सकते. केवल दोस्तों के साथ हंस सकते हैं और दोस्तों से तो हम मिलते ही नहीं! फिर कैसे हंसें.

इसलिए सबसे पहले हमने जो सीखा उसे भूलने की ज़रूरत है. उन बातों को भूलना जो हमें सोशल एटिकेट्स के तहत सिखाई गई हैं. यहां मत हंसो, ऐसे मत हंसो, अभी मत हंसो. उन गैजेट्स की दुनिया से बाहर निकल जाने की ज़रूरत है, जहां हम खो गए हैं. चमकती स्क्रीन से बाहर निकलकर बच्चों के मासूम चेहरे और उन लोगों का साथ खोजने की ज़रूरत है जो चेहरे पर मुस्कुराहट ला सकती है. सोचिए न कितने साल हो गए आपने सहकर्मी को गौर से नहीं देखा, अपने साथ यात्रा करने वाले सहयात्री पर नज़र नहीं डाली. कोई कार्टून ‌फ़िल्म नहीं देखी. बस देखा है, तो यह कि मार्च आ गया एप्रेज़ल फ़ॉर्म भरना है, इस बार किसी भी तरह प्रमोशन लेना है, अपने सहकर्मी को कोई भी ऐसा काम नहीं देना, जिससे उसकी हैसियत बढ़े. जब हम इसी में उलझे रहेंगे तो फिर हंसेंगे कब. फिर से छोटे बच्चे बन जाइए और अपने सारे तटबंध खोल दीजिए. आख़िर यही तो ज़िंदगी है. वो मुस्कुराहट ही क्या जो सिर्फ़ फ़ोटो खिंचवाते वक़्त आए. चेहरा हमेशा ऐसा रहना चाहिए कि लोग कहें आपसे मिलकर तनाव भूल जाते हैं. अपने मन को बच्चों का मन बना लीजिए फिर देखिए यह हंसी बचकर कहां जाती है.


संक्रमण फैलाइए
मुस्कुराना संक्रमण है, सुना होगा. इस संक्रमण को फैलने दीजिए. यह कोई फ़्लू थोड़ी है, जो इससे बचा जाए. मुस्कुराना हंसने की पहली सीढ़ी है. पहले इसकी कोशिश कीजिए तभी गगनभेदी ठहाके तक पहुंच पाएंगे. ठहाका लगाना एक अभ्यास है जो धीरे-धीरे ही आएगा. इसलिए पहले संक्रमित हो जाइए. जो लोग ज़ोर से हंसते हैं, उन्हें ब्लड प्रेशर की समस्या न के बराबर होती है. उनका दिमाग़ न हंसने वालों की अपेक्षा तेज़ और रचनात्मक होता है. हंसी तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन कार्टिसोल की मात्रा घटा देती है, रक्तवाहिनियां खोल देती है. सारे तटबंध खुल जाने से शरीर ताज़गी महसूस करता है और किसी भी तरह के दर्द से राहत देता है. यह दवा है, इसे रोज़ दिन में तीन बार लीजिए. यह इतना कठिन भी नहीं, बस आपको ख़ुद सोचना पड़ेगा कि आप ख़ुश रहना चाहते हैं, परिस्थिति कोई भी हो. 


करना क्या होगा
कुछ नहीं, बहुत आसान से छोटे-छोटे उपाय. जैसे, अपने आसपास के लोगों से प्रेम करना सीखिए. जब वे लोग आपके जीवन में शामिल हो जाएंगे तो संवाद बढ़ाइए. कोई चुटकुला फ़ॉरवर्ड करने के बजाय सुनाइए. हो सके तो पूरे हाव-भाव के साथ. अपने बचपन की किसी आदत पर हंसिए. ट्रेन या बस में कोई व्यक्ति मिला हो, उसकी कोई विशेष हरक़त याद कर दोस्तों को सुनाइए. जब आप ख़ुद पर हंसना सीख जाते हैं तो हर बात में हास्य खोज लेते हैं. तानाशाह स्वभाव वालों के अलावा कोई भी व्यक्ति इतना महान नहीं होता कि ख़ुद पर हंस न सके. हर छोटी से छोटी बात में आनंद उठाइए. जब आप छोटी-छोटी बातों पर हंसना सीख जाएंगे तो ख़ुद ब ख़ुद अगली श्रेणी ठहाके तक पहुंच जाएंगे. कुछ महिलाएं सिर्फ़ इसलिए खुल कर नहीं हंसती कि गंभीरता उनकी परवरिश का हिस्सा होती है. शुरुआत में ही कहा गया है, जो सीखा है उसे भूलने की कोशिश कीजिए. लड़कियां ठहाका लगा कर हंसे तो अभद्रता मानी जाती है. लेकिन किसी को पलट कर जवाब देना या बदमिज़ाज़ी करना ज़्यादा बड़ी अभद्रता है. अपनी सहेलियों को, परिवार की महिलाओं को खुलकर हंसने के लिए प्रेरित कीजिए. इसमें कोई ख़र्चा नहीं आता. महिलाएं शॉपिंग करने से जितना तनाव रहित रहती हैं, हंसी भी उनके लिए वहीं काम करती है.


ऐसे काम करती है हंसी
शरीर में ढेर सारे न्यूरॉन्स होते हैं. न्यूरॉन्स शरीर में एक जगह से दूसरी जगह संदेश ले जाने का काम करते हैं. इन्हें न्यूरोट्रांसमीटर कहा जाता है. जब हम हंसते हैं तो न्यूरोट्रांसमीटर पर अच्छा असर पड़ता है. हंसने से एंडोर्फ़िन हार्मोन तेज़ी से शरीर में यहां से वहां दौड़ता है और व्यक्ति हल्का महसूस करता है. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि यह हार्मोन दर्द निवारक का भी काम करता है. कभी न कभी आपके साथ भी ऐसा हुआ होगा कि आप भयंकर ग़ुस्से में रहे होंगे और किसी ने कोई हल्की बात कह दी होगी और हंस दिए होंगे. दरअसल हंसी शरीर पर इतनी तरह से काम करती है कि इसका पूरा फ़ायदा बता पाना किसी के लिए संभव नहीं है. जब न्यूरोट्रांसमीटर सक्रिय होते हैं तो मूड ख़ुद बदल जाता है और समस्याओं के समाधान अपने आप सूझ जाते हैं. 
यदि किसी को लगता है, हंसना मूर्खों का काम है, तो ऐसे मूर्ख बनना घाटे का सौदा नहीं है. कोशिश कीजिए आप फ़ॉर्वर्ड की दुनिया से बाहर निकलें और वास्तविक दुनिया में दोस्तों के साथ रम जाएं. आख़िर स्माइली इमोटिकॉन फ़ोन की स्क्रीन से ज़्यादा चेहरे पर अच्छे लगते हैं. है न.

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